बीती विभावरी जाग री!
बीती विभावरी जाग री!
                  अम्बर पनघट में डुबो रही
                  तारा घट ऊषा नागरी।
खग कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
                  लो यह लतिका भी भर लाई
                  मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये
                  तू अब तक सोई है आली
                  आँखों में भरे विहाग री।
- जयशंकर प्रसाद
काव्यपाठ: विनोद तिवारी

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'जो हवा में है'
उमाशंकर तिवारी


जो हवा में है, लहर में है
क्यों नहीं वह बात
मुझमें है?

शाम कंधों पर लिए अपने
ज़िन्दगी के रू-ब-रू चलना
रोशनी का हमसफ़र होना
उम्र की कन्दील का जलना
आग जो
जलते सफ़र में है
क्यों नहीं वह बात
मुझमें है?
..

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शुक्रवार 22 नवम्बर को

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