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बीती विभावरी जाग री!

बीती विभावरी जाग री!
                  अम्बर पनघट में डुबो रही
                  तारा घट ऊषा नागरी।
खग कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
                  लो यह लतिका भी भर लाई
                  मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिये,
अलकों में मलयज बंद किये
                  तू अब तक सोई है आली
                  आँखों में भरे विहाग री।
- जयशंकर प्रसाद
काव्यपाठ: उर्मिला प्रसाद
विभावरी : रात। आली : सखि
चित्रकला : नूपुर अशोक। एनिमेशन : सुकन्या दे। वीडियो निर्देशन : वाणी मुरारका

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इस महीने :
'बसंत और पतझड़ '
मेरी ऑलिवर


मैं तेज़ी से भागी स्कूल के बाहर
बगीचे से होते हुए, जंगल तक
बिताया पूरा बसंत, अब तक का सीखा भूलने में

दो दूनी चार और मेहनत और बाकी सब
बनना विनम्र और उपयोगी, होना सफल और बाकी सब
मशीन और तेल, प्लास्टिक और पैसे और बाकी सब
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'भीतर शिखरों पर रहना है'
अनिता निहलानी


ख़्वाब देखकर सच करना है
ऊपर ही ऊपर चढ़ना है,
जीवन वृहत्त कैनवास है
सुंदर सहज रंग भरना है!

साथ चल रहा कोई निशदिन
हो अर्पित उसको कहना है,
इक विराट कुटुंब है दुनिया
सबसे मिलजुल कर रहना है!
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इस महीने :
'भीतर बहुत दूर'
अनीता वर्मा


भीतर बहुत दूर
एक घेरा है
दुनिया के उपजे रास्तों का भूरा विस्तार
आँखों के जलकुंडों के किनारे
तुम्हारे अनगिनत प्रतिरूप
निर्वसन उनसे लिपटती हुई मेरी आत्मा

भीतर बहुत दूर
इस दुनिया के पीछे से
झाँकती है एक दुनिया
..

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