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कामायनी ('निर्वेद' सर्ग के कुछ छंद)
"तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन!
विकल होकर नित्य चंचल,
खोजती जब नींद के पल,
चेतना थक-सी रही तब,
मैं मलय की वात रे मन!
चिर-विषाद-विलीन मन की,
इस व्यथा के तिमिर-वन की;
मैं उषा-सी ज्योति-रेखा,
कुसुम-विकसित प्रात रे मन!
जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,
चातकी कन को तरसती,
उन्हीं जीवन-घाटियों की,
मैं सरस बरसात रे मन!
पवन की प्राचीर में रुक
जला जीवन जी रहा झुक,
इस झुलसते विश्व-दिन की
मैं कुसुम-ऋतु-रात रे मन!
चिर निराशा नीरधर से,
प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,
मधुप-मुखर-मरंद-मुकुलित,
मैं सजल जलजात रे मन!"
-
जयशंकर प्रसाद
तुमुल कोलाहल
: तीव्र शोरगुल;
मलय की वात
: मलय पर्वत की सुगंधित हवा;
चिर-विषाद-विलीन
: लंबे समय तक दुख में डूबा;
तिमिर
: अंधकार;
प्राचीर
: दीवार;
नीरधर
: बादल;
प्रतिच्छायित
: छाया हुआ;
अश्रु-सर
: आँसुओं का तालाब;
मधुप
: भँवरा;
मरंद-मुकुलित
: फूलों के पराग को फैलाने वाली;
जलजात
: कमल
विषय:
आशा विश्वास (19)
उदासी (19)
प्रेरणा (20)
अन्तर्मन (14)
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'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे
छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
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हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने
ईंटों की दीवा ..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'
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बस यूँ ही देखें सब कुछ,
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कौन सा यह भ्रम है?
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
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