कामायनी ('निर्वेद' परिच्छेद के कुछ छंद)
"तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन!

        विकल होकर नित्य चंचल,
        खोजती जब नींद के पल,
        चेतना थक-सी रही तब,
        मैं मलय की वात रे मन!

चिर-विषाद-विलीन मन की,
इस व्यथा के तिमिर-वन की;
मैं उषा-सी ज्योति-रेखा,
कुसुम-विकसित प्रात रे मन!

        जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,
        चातकी कन को तरसती,
        उन्हीं जीवन-घाटियों की,
        मैं सरस बरसात रे मन!

पवन की प्राचीर में रुक
जला जीवन जी रहा झुक,
इस झुलसते विश्व-दिन की
मैं कुसुम-ऋतु-रात रे मन!

        चिर निराशा नीरधर से,
        प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,
        मधुप-मुखर-मरंद-मुकुलित,
        मैं सजल जलजात रे मन!"
- जयशंकर प्रसाद

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जयशंकर प्रसाद
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'पेड़'
जोएस किलमर


मैं शायद कभी न देखूँगा,
एक पेड़ सी सुन्दर कविता।

पेड़, जिसके वह भूखे होंठ,
वसुधा स्तन-धारा पे हैं लोट।

पेड़, जिसका रुख ईश्वर ओर,
पल्लवित भुजाएं विनय विभोर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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'चल पथिक तू हौले से'
प्रिया एन. अइयर


टहल रहा गर भोर से पहले
पग तू रखना धीरे से
जगे हुए हैं जीव-जंतु
मानव तुमसे पहले से

खरगोश, कीट और खग निकले
नीड़, बिल, कुंड से खुल के
चंचल अबोध छौने संग
चली हिरन निर्भयता  से

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
चलो समय के साथ चलेंगे,
परिवर्तन होगा धरती पर।
नया ज़माना पैदा होगा,
बूढ़ी दुनिया की अर्थी पर।

जो कुछ हम पर बीत चुकी है,
उस से मुक्त रहो, ओ नवयुग।
नए नए फूलों से महको,
मेरे मधुवन, जीयो जुग जुग।

~ विनोद तिवारी की कविता "मेरे मधुवन" का अंश संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" से

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