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कामायनी ('निर्वेद' परिच्छेद के कुछ छंद)
"तुमुल कोलाहल कलह में
मैं हृदय की बात रे मन!

        विकल होकर नित्य चंचल,
        खोजती जब नींद के पल,
        चेतना थक-सी रही तब,
        मैं मलय की वात रे मन!

चिर-विषाद-विलीन मन की,
इस व्यथा के तिमिर-वन की;
मैं उषा-सी ज्योति-रेखा,
कुसुम-विकसित प्रात रे मन!

        जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,
        चातकी कन को तरसती,
        उन्हीं जीवन-घाटियों की,
        मैं सरस बरसात रे मन!

पवन की प्राचीर में रुक
जला जीवन जी रहा झुक,
इस झुलसते विश्व-दिन की
मैं कुसुम-ऋतु-रात रे मन!

        चिर निराशा नीरधर से,
        प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,
        मधुप-मुखर-मरंद-मुकुलित,
        मैं सजल जलजात रे मन!"
- जयशंकर प्रसाद

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इस महीने :
'हर मकान बूढ़ा होता'
कुमार रवीन्द्र


साधो, सच है
जैसे मानुष
धीरे-धीरे हर मकान भी बूढ़ा होता

देह घरों की थक जाती है
बस जाता भीतर अँधियारा
उसके हिरदय नेह-सिंधु जो
वह भी हो जाता है खारा

घर में
जो देवा बसता है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'अधूरी'
प्रिया एन. अइयर


हर घर में दबी आवाज़ होती है
एक अनसुनी सी
रात में खनखती चूड़ियों की
इक सिसकी सी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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