अप्रतिम कविताएँ

अनमनी है सांझ
बहुत ही अनमनी है सांझ, कैसे तो बिताएं हम!

अचानक ही
छलक आये नयन कुछ
कह रहे, देखो,
अचानक भर उठे
स्वर, मन, हृदय
अवसाद से, देखो,

भला क्या-क्या छुपाओ तुम, भला क्या-क्या छुपाएं हम !

घनेरा सुरमई आकाश
भीतर तक
उतर आया,
किसी शरबिद्ध पंछी सा
अकिंचन मन
है घबराया,

चलो कुछ गुनगुनाओ तुम, चलो कुछ गुनगुनाएं हम !
बहुत ही अनमनी है सांझ, कैसे तो बिताएं हम !!
- अमृत खरे
अवसाद : दुख; शरबिद्ध : बाण से घायल; अकिंचन : थोड़ा सा

अमृत खरे का काव्य संकलन : मयूर पंख (गीत संग्रह)
विषय:
शाम (11)
उदासी (19)

काव्यालय को प्राप्त: 14 May 2019. काव्यालय पर प्रकाशित: 14 Feb 2020

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
अमृत खरे
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अनमनी है सांझ
 अभिसार गा रहा हूँ
 कॉरोना काल का प्रेम गीत
इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website