व्यथा जी उठी
अचेत की धूल में गढ़ी,
जंग से मढ़ी,
बरसों पहले की व्यथा,
मौन थी, सुप्त थी।
अपने आपको लपेटे थी।
चेतन ने उसे गाड़ा था यहाँ,
सँभाल न पा रहा था, अपने यहाँ।
उस दिन किसी ने,
अनजाने में
उसे छू लिया,
तो वह कराह उठी,
कुलबुला उठी,
मृत व्यथा
फिर जीवित हो गयी थी।
चेतन ने भी
उसके जी उठने पर
कुछ अश्रु-बूँदें
बहायी थीं।
- गीता मल्होत्रा
Geeta Malhotra
Email: [email protected]
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गीता मल्होत्रा
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 व्यथा जी उठी
 होली की शाम
इस महीने :
'शीत का आतंक'
लक्ष्मी नारायण गुप्त


कटकटाती शीत में
सूर्य के सामने ही
आज फिर से
कल की तरह
पारदर्शी हिम पर्त
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और मेरे ज्ञान का सूर्य
देखने भर को विवश था।
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जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम, विश्वास बहुत है।

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जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम, विश्वास बहुत है।
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~ विनोद तिवारी
(कविता "लो तुम्हारे पास आए" से)
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