अप्रतिम कविताएँ
होली की शाम
होली की शाम सड़कें वीरान
जैसे गुज़र गया हो कारवाँ
छोड़ गया कुछ अपनी निशानियाँ --
बिखरे हुए रंग, फूटे गुब्बारे,
बिछे हुए पीपल के पत्ते,
डाल से टूटे चम्पा के फूल...
इक्का-दुक्का किशोरों की टोलियाँ,
लौटती घरों को,
रंगे हुए कपड़े और पुते हुए चेहरे
बयाँ कर रहे हैं ये दास्ताँ --
अभी अभी गुज़र गया यहाँ से
रँगों का एक कारवाँ
- गीता मल्होत्रा
विषय:
होली (9)

काव्यालय को प्राप्त: 18 Mar 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 22 Mar 2019

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अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
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हल, जो यादों को कुरेदते हुए
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..

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अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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