होली की शाम
होली की शाम सड़कें वीरान
जैसे गुज़र गया हो कारवाँ
छोड़ गया कुछ अपनी निशानियाँ --
बिखरे हुए रंग, फूटे गुब्बारे,
बिछे हुए पीपल के पत्ते,
डाल से टूटे चम्पा के फूल...
इक्का-दुक्का किशोरों की टोलियाँ,
लौटती घरों को,
रंगे हुए कपड़े और पुते हुए चेहरे
बयाँ कर रहे हैं ये दास्ताँ --
अभी अभी गुज़र गया यहाँ से
रँगों का एक कारवाँ
- गीता मल्होत्रा
Geeta Malhotra
Email: [email protected]

काव्यालय को प्राप्त: 18 Mar 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 22 Mar 2019

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दुनियाँ में जिनका कुछ आधार नहीं
मैं आँख मिलाता हूँ उन आँखों से
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आँखों की भाषा तो अनगिन हैं
जो भी सुन्दर हो वह समझा देना।

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