स्मृति दीप
भग्न उर की कामना के दीप,
         तुम, कर में लिये,
मौन, निमंत्र्ण, विषम, किस साध में हो बाँटती?
         है प्रज्वलित दीप, उद्दीपित करों पे,
                 नैन में असुवन झड़ी!
         है मौन, होठों पर प्रकम्पित,
                 नाचती, ज्वाला खड़ी!
बहा दो अंतिम निशानी, जल के अंधेरे पाट पे,
' स्मृतिदीप ' बन कर बहेगी, यातना, बिछुड़े स्वजन की!
         एक दीप गंगा पे बहेगा,
                 रोयेंगी, आँखें तुम्हारी।
     धुप अँधकाररात्रि का तमस।
         पुकारता प्यार मेरा तुझे, मरण के उस पार से!
बहा दो, बहा दो दीप को
         जल रही कोमल हथेली!
     हा प्रिया! यह रात्रिवेला औ
         सूना नीरवसा नदी तट!
नाचती लौ में धूल मिलेंगी,
         प्रीत की बातें हमारी!
- लावण्या शाह

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लावण्या शाह
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'कोयल का सितार'
अशोक चक्रधर


एक बार वह उड़ते उड़ते, उड़ते ही उड़ते मस्ती में,
जंगल के कुछ बाहर आकर, पहुँची अनजानी बस्ती में।

बस्ती में टीले के ऊपर, सुन्दर सा इक छोटा घर था,
गूँज रहा संगीत जहाँ पर, लहराता सितार का स्वर था।

जैसे कोई जादू कर दे, जैसे चुम्बक लोहा खींचे,
उस सितार की स्वरलहरी से, खिंचकर कोयल आई नीचे।
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शुक्रवार 16 नवम्बर को

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