शून्य कर दो
मुझको फिर से शून्य कर दो
तुम्हारे योग से ही तो पूर्ण हुआ था
फिर भूल गया
मेरा अस्तित्व था नगण्य
तुमसे जुड़े बिन
नए अंकों से मिल कर
मैंने मान लिया था स्वयं को
पूर्ण से भी कुछ अधिक
आज जब अंतरमन से भाग न सका
तो बोध हुआ ये
के तुमने ही तो इस निष्प्राण को
जीवन दिया था
आत्म-ग्लानि से होके विचलित
कर रहा हूँ तुमसे विनती
मुझको फिर से शून्य कर दो
हो सकूँ यदि मैं परिष्कृत
फिर भले तुम पूर्ण कर दो
पर आज मुझको शून्य कर दो
- विनीत मिश्रा

काव्यालय को प्राप्त: 23 Apr 2014. काव्यालय पर प्रकाशित: 7 Jun 2018

***
इस महीने : जीवन्त सहजता
'जो हवा में है'
उमाशंकर तिवारी


जो हवा में है, लहर में है
क्यों नहीं वह बात
मुझमें है?

शाम कंधों पर लिए अपने
ज़िन्दगी के रू-ब-रू चलना
रोशनी का हमसफ़र होना
उम्र की कन्दील का जलना
आग जो
जलते सफ़र में है
क्यों नहीं वह बात
मुझमें है?
..

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शुक्रवार 22 नवम्बर को

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