अप्रतिम कविताएँ
प्रेम अक्षत
आप सुन तो रहें हैं
मेरे गीत यह,
मन के मन्दिर में दीपक
जलाये तो हैं
आपके सामने बैठ कर
अनगिनत, अश्रु पावन
नयन से गिराये तो हैं
नेह की डालियों से
सुगन्धित सुमन
सांवरे श्री चरण पर
चढ़ाये तो हैं
मेरी पूजा में रोली
न चन्दन प्रिय
भाल पर प्रेम अक्षत
लगाये तो हैं
क्यों मैं घंटा ध्वनि से
जगाऊं तुम्हें
साज, सरगम के स्वर
गुनगुनाये तो हैं
भूल न जाना कभी
यह तुच्छ भक्ति मेरी
भाव कविता में गढ़
कर सुनाये तो हैं
यह जन्म आपके
रंग में रंग लिया
स्वप्न अगले जन्म के
सजाये तो हैं।
- आभा सक्सेना
विषय:
भक्ति और प्रार्थना (31)

काव्यालय को प्राप्त: 2 Feb 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 5 Feb 2021

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
आभा सक्सेना
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 कैसा परिवर्तन
 प्रेम अक्षत
इस महीने :
'आठ वर्ष'
जया प्रसाद


रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी-सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी

गोल-मटोल, चार पैर पर
घर-आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'यूंँ पति की मांँ बनते जाना'
किरण सिपानी


हर पल वीडियो दिखाकर फुसलाते जाना
और यूंँ कौरों का हलक से उतरते जाना ‌
कभी वायलिन पकड़ना, कभी झटक के रख देना
रूठना- मचलना- न नहाने की ज़िद करते रहना
कातर नजरों से मेरे हुक्म को सिर्फ तकते रहना
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website