अप्रतिम कविताएँ
कैसा परिवर्तन
प्रकृति मौन हो देख रही है
आज समय का परिवर्तन
मृत्यु खेलती है आंगन में
करती है भीषण नर्तन।

झंझावातों में मनुष्य का
साहस संबल टूट गया
भूल गया सब खेल अनोखे
भूल गया पूजा अर्चन।

कैद हुआ है घर में मानव
जीवन का क्रम भूल गया
स्वयं समय से पूछ रहा है
कैसा है यह परिवर्तन।

दौड़ रहा हर नर अब घर को
रोजी अपनी भूल गया
पुनः पुरानी माटी से ही
जोड़ रहा टूटे बंधन।

अन्नपूर्णा धरती माँ के
रोते चिल्लाते बच्चे
भूख से मारे मारे फिरते
कैसा है जीवन दर्शन।

जान हथेली पर ले देवता
श्वेत वस्त्र में आये हैं
शायद किसी औषधि से बच
जाए जीवन हो नूतन ।

करुणानिधि भी चुप बैठे हैं
क्यों करुणा में देर हुई
करुण पुकारें हिला न पाई
क्यों श्री जी का सिंहासन।
- आभा सक्सेना
विषय:
कॉरोना और लॉक डाउन (5)

काव्यालय को प्राप्त: 2 May 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 May 2020

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
आभा सक्सेना
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 कैसा परिवर्तन
 प्रेम अक्षत
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'गुनाह का गीत'
धर्मवीर भारती


अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website