फिर मन में ये कैसी हलचल ?
           वर्षों से जो मौन खड़े थे
           निर्विकार निर्मोह बड़े थे
उन पाषाणों से अब क्यूँकर अश्रुधार बह निकली अविरल
           फिर मन में ये कैसी हलचल ?

           निश्चल जिनको जग ने माना
           गुण-स्वभाव से स्थिर नित जाना
चक्रवात प्रचंड उठते हैं क्यूँ अंतर में प्रतिक्षण, प्रतिपल
           फिर मन में ये कैसी हलचल ?

           युग बीते जिनसे मुख मोड़ा
           जिन स्मृतियों को पीछे छोड़ा
अब क्यूँ बाट निहारें उनकी पलपल होकर लोचन विह्वल?
           फिर मन में ये कैसी हलचल ?
- अर्चना गुप्ता
Archana Gupta
Email : [email protected]
Archana Gupta
Email : [email protected]

***
अर्चना गुप्ता
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 इक कविता
 फिर मन में ये कैसी हलचल ?
इस महीने :
'धत्'
दिव्या माथुर


सीधा
मेरी आँखों में
बेधड़क घूरती
बिल्ली सा
वह एक
निडर ख़्याल तेरा
टाँगों के बीच
पूँछ दबा
मेरी एक धत् से
भाग लिया।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'हाइकु'
अनूप भार्गव


मुठ्ठी में कैद
धूप फिसल गयी
लड़की हँसी ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'बूँदें'
कुसुम जैन


बरसती हैं बूँदें
झूमते हैं पत्ते

पत्ता-पत्ता जी रहा है
पल पल को

आने वाले कल से बेख़बर
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website