अप्रतिम कविताएँ
पतझड़ की पगलाई धूप
भोर भई जो आँखें मींचे,
तकिये को सिरहाने खींचे,
लोट गई इक बार पीठ पर
ले लम्बी जम्हाई धूप,
अनमन सी अलसाई धूप |

पोंछ रात का बिखरा काजल,
सूरज नीचे दबता आँचल,
खींच अलग हो दबे पैर से,
देह-चुनर सरकाई धूप,
यौवन ज्यों सुलगाई धूप |

फुदक-फुदक खेले आँगन भर
खाने-खाने एक पाँव पर,
पत्ती-पत्ती आँख-मिचौली
बचपन सी बौराई धूप,
पतझड़ की पगलाई धूप |
- मानोशी चटर्जी
Manoshi Chatterjee
Email : [email protected]
विषय:
प्रकृति (41)
पतझड़ (2)
सूरज धूप (8)

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 पतझड़ की पगलाई धूप
 प्रिय तुम...
 शाम हुई और तुम नहीं आये
 हे प्रियतम
इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र


तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।

ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!

तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

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