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हे प्रियतम
हे प्रियतम
अद्भुत छवि बन
सुन्दरतम
बसे हो तुम
मन मन्दिर मे
आराध्य बन
भ्रमर जैसे
पागल बन ढूँढू
मैं पुष्पवन
तुम झरना
मैं इंद्रधनुष के
रंगीन कण
चंचलता मैं
ज्यों अल्हड़ लहर
सागर तुम
तुम विशाल
अनंत युग जैसे
मैं एक क्षण
हो तरुवर
अडिग धीर स्थिर
तो मैं पवन
जैसे ललाट
पर कोरी बिन्दिया
सजे चन्दन
हे प्रियतम....
-
मानोशी चटर्जी
Manoshi Chatterjee
Email :
[email protected]
Manoshi Chatterjee
Email :
[email protected]
विषय:
प्रेम (63)
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की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
पतझड़ की पगलाई धूप
प्रिय तुम...
शाम हुई और तुम नहीं आये
हे प्रियतम
इस महीने :
'तू ज़िंदा है'
शैलेंद्र
तू ज़िंदा है तो ज़िंदगी की जीत पे यक़ीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर।
ये सुबह-ओ-शाम के रँगे हुए गगन को चूमकर
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूम कर!
तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीन कर।
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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