निश्छल भाव
मेरे अन्दर एक सूरज है, जिसकी सुनहरी धूप
देर तक मन्दिर पे ठहर कर
मस्जिद पे पसर जाती है !
शाम ढले, मस्जिद के दरो औ-
दीवार को छूती हुई मन्दिर की
चोटी को चूमकर छूमन्तर हो जाती है !

मेरे अन्दर एक चाँद है, जिसकी रूपहली चाँदनी
में मन्दिर और मस्जिद
धरती पर एक हो जाते है !
बड़े प्यार से गले लग जाते हैं !
उनकी सद्भावपूर्ण परछाईयाँ
देती हैं प्रेम की दुहाईयाँ !

मेरे अन्दर एक बादल है, जो गंगा से जल लेता है
काशी पे बरसता जमकर
मन्दिर को नहला देता है,
काबा पे पहुँचता वो फिर
मस्जिद को तर करता है !
तेरे मेरे दुर्भाव को, कहीं दूर भगा देता है !

मेरे अन्दर एक झोंका है, भिड़ता कभी वो आँधी से,
तूफ़ानों से लड़ता है,
मन्दिर से लिपट कर वो फिर
मस्जिद पे अदब से झुक कर
बेबाक उड़ा करता है !
प्रेम सुमन की खुशबू से महका-महका रहता है !

मेरे अन्दर एक धरती है, मन्दिर को गोदी लेकर
मस्जिद की कौली भरती है,
कभी प्यार से उसको दुलराती
कभी उसको थपकी देती है,
ममता का आँचल ढक कर दोनों को दुआ देती है !

मेरे अन्दर एक आकाश है, बुलन्द और विराट है,
विस्तृत और विशाल है,
निश्छल और निष्पाप है,
घन्टों की गूँजें मन्दिर से,
उठती अजाने मस्जिद से
उसमें जाकर मिल जाती है करती उसका विस्तार है !
- दीप्ति गुप्ता
Dr. Deepti Gupta
Email: [email protected]
Deepti Gupta
Email: [email protected].in

***
दीप्ति गुप्ता
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 निश्छल भाव
 मृत्यु: दो प्रतिछवि (१)
 मृत्यु: दो प्रतिछवि (२)
 रिश्ते
इस महीने :
'किसके संग गाए थे'
मिलाप दूगड़


रात यदि श्याम नहीं आए थे
मैंने इतने गीत सुहाने किसके संग गाए थे?

गूँज रहा अब भी वंशी स्वर,
मुख-सम्मुख उड़ता पीताम्बर।
किसने फिर ये रास मनोहर
वन में रचवाये थे?

शंका क्यों रहने दें मन में
चल कर सखि देखें मधुवन में
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
वो खुशी जो कहीं नहीं हासिल।
जो मुअस्सर* नहीं ज़माने में।
ख़्वाबगाहों* से चल के आएगी
ख़ुदबख़ुद तेरे आशियाने में।

~ विनोद तिवारी

*मुअस्सर: प्राप्त करने योग्य; ख्वाबगाहों - सपनों की जगह;

संकलन "समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न" में कविताओं के बीच बीच कई मुक्तक भी हैं, जैसे कि यह

तोड़ दो सीमा क्षितिज की,
गगन का विस्तार ले लो


विनोद तिवारी की कविता "प्यार का उपहार" का वीडियो। उपहार उनका और वीडियो द्वारा उपहार का सम्प्रेषण भी वह ही कर रहे हैं। सरल श्रृंगार रस और अभिसार में भीगा, फिर भी प्यार का उपहार ऐसा जो व्यापक होने को प्रेरित करे।

प्यार का उपहार
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website