अप्रतिम कविताएँ
लेन-देन
लेन-देन का हिसाब
          लंबा और पुराना है।

जिनका कर्ज हमने खाया था,
          उनका बाकी हम चुकाने आये हैं।
और जिन्होंने हमारा कर्ज खाया था,
          उनसे हम अपना हक पाने आये हैं।

लेन-देन का व्यापार अभी लंबा चलेगा।
          जीवन अभी कई बार पैदा होगा
                    और कई बार जलेगा।

और लेन-देन का सारा व्यापार
                जब चुक जायेगा,
          ईश्वर हमसे खुद कहेगा -

          तुम्हार एक पावना मुझ पर भी है,
          आओ, उसे ग्रहण करो।
          अपना रूप छोड़ो,
          मेरा स्वरूप वरण करो।
- रामधारी सिंह 'दिनकर'
Ref: Hare Ko Harinaam
Pub: Udayachal, Rajendra Nagar, Patna-16
विषय:
जीवन (37)
अध्यात्म दर्शन (38)

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..

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..

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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