अप्रतिम कविताएँ
लेखक

ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए
दिलो-ओ-दिमाग़ पर
चलता रहता है लगातार।

फिर प्रेम की नमी टटोलकर
गहरी बोनी पड़ती हैं भावनाएँ,
सींचनी पड़ती है शैली कई बार,
करनी पड़ती है रखवाली अर्थों की।

तब कहीं पन्ने पर फूटती हैं मात्राएँ,
लहराती है फ़सल शब्दों की।

इस बार जब कोई किताब खोलो
तो देखना, पन्ने के किसी कोने पर
सुस्ता रहा होगा लेखक।
- आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
काव्यपाठ: आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
काव्य-संग्रह ‘ग़लत और सही के पार’ से
विषय:
सृजन (11)

काव्यालय को प्राप्त: 10 Nov 2025. काव्यालय पर प्रकाशित: 19 Jun 2026

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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