अप्रतिम कविताएँ
जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
- विनोद कुमार शुक्ल

काव्यालय को प्राप्त: 2 Apr 2023. काव्यालय पर प्रकाशित: 14 Apr 2023

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पिकी पुकारती रही, पुकारते धरा-गगन;
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वियोगिनी वसन्त की...

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प्यास तो तुम्हीं बुझाओगी नदी
मैं तो सागर हूँ
प्यासा
अथाह।

तुम बहती रहो
मुझ तक आने को।
मैं तुम्हें लूँगा नदी

..

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