अप्रतिम कविताएँ
पुकार
कोई कथा अनकही न रहे
व्यथा कोई अनसुनी न रहे,
जिसने कहना-सुनना चाहा
वाणी उसकी मुखर हो रहे!

एक प्रश्न जो सोया भीतर
एक जश्न भी खोया भीतर,
जिसने उसे जगाना चाहा
निद्रा उसकी स्वयं सो रहे!

एक चेतना व्याकुल करती
एक वेदना आकुल करती,
जिसने उससे बचना चाहा
पीड़ा उसकी सखी हो रहे!

कोई प्यास अनबुझी न रहे
आस कोई अनपली न रहे,
जिसने उसे पोषणा चाहा
सहज अस्मिता कहीं खो रहे!

एक पुकार बुलाती है जो
इक झंकार लुभाती है जो,
जिसने उसको सुनना चाहा
घुलमिल उससे एक हो रहे!
- अनिता निहलानी
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 13 Mar 2023. काव्यालय पर प्रकाशित: 3 Jan 2025

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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