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अबूझ है हर पल यहाँ

नहीं, कुछ नहीं कहा जा सकता
हुआ जा सकता है
खोया जा सकता है
डूबा जा सकता है
नहीं, कुछ नहीं कहा जा सकता
फूल के सौंदर्य के बारे में
पीया जा सकता है
मौन रहकर
नहीं खोले जा सकते जीवन के रहस्य
जीवन जिया जा सकता है
नृत्य कहाँ से आता है
कौन जानता है?
थिरका जा सकता है
यूँ ही किसी धुन, ताल पर
कहाँ से आती है मस्ती
कबीर की
वहाँ ले जाया नहीं
खुद जाया जा सकता है
डोला जा सकता है
उस नाद पर
जो सुनाया नहीं जा सकता
सुना जा सकता है
प्रकाश की नदी में डूबते उतराते भी
बाहर अँधेरा रखा जा सकता है
जो कहा ही नहीं जा सकता
उसके लिए शब्दों को
विश्राम दिया जा सकता है!
- अनिता निहलानी

काव्यालय को प्राप्त: 30 May 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 2 Nov 2017

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सुबह के होने की अपनी अनुभूति और अनुपम कल्पना को एक कवि खूबसूरत शब्दों में ढालता है। उसे ऐसे मधुर सुर और नयनाभिराम मौलिक चित्रांकन मिलते हैं कि कविता सजीव हो आपके अंतर्मन में सुकून बन कर उतर जाती है -- इसे ही साकार किया है काव्यालय ने अपनी इस विशिष्ट प्रस्तुति में

इस महीने :
'ज़िंदगी की नोटबुक'
भावना सक्सैना


बहुत चाहा फेयर रखूँ
ज़िन्दगी की नोटबुक को
लेकिन हमेशा रफ ही पाया...

कॉपी के उन आखिरी दो पन्नों की तरह
जिन पर होते हैं हिसाब अनगिन
हिसाब बिठाने की कोशिश में
लेकिन, छूटा कोई हासिल
गुणा करते हुए, भाग ही पाया
बहुत चाहा...
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'अक्कड़ मक्कड़'
भवानीप्रसाद मिश्र


अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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