अप्रतिम कविताएँ
ओ माँ बयार
सूरज को, कच्ची नींद से
जगाओ मत।
दूध-मुँहे बालक-सा
दिन भर झुंझलायेगा
मचलेगा, अलसायेगा
रो कर, चिल्ला कर,
घर सिर पर उठायेगा।
आदत बुरी है यह
किन्तु बालक तुम्हारा है,
ओ माँ बयार!
थपकियाँ दे-देकर सुला दो
इसे बादल उढ़ा दो
इस तरह रुलाओ मत।
सूरज को कच्ची नींद से
जगाओ मत।
- शान्ति मेहरोत्रा
संकलन रूपाम्बरा से
विषय:
प्रकृति (41)
सूरज धूप (8)
बाल कविता (10)
सर्दी (5)

काव्यालय को प्राप्त: 15 Apr 2024. काव्यालय पर प्रकाशित: 6 Dec 2024

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
शान्ति मेहरोत्रा
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 एक मनःस्थिति
 ओ माँ बयार
इस महीने :
'नदी के द्वीप'
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'


हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'कल'
रणजीत मुरारका


कल कहाँ किसने
कहा देखा सुना है
फिर भी मैं कल के लिए
जीता रहा हूँ।

आज को भूले
शंका सोच भय
से काँपता
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'365 सिक्के'
पारुल 'पंखुरी'


तीन सौ पैंसठ
सिक्के थे गुल्लक में
कुछ से मुस्कुराहटें खरीदीं
कुछ से दर्द,
कुछ से राहतें,
कुछ खर्चे ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website