अप्रतिम कविताएँ
जल कर दे
ईश्वर मुझको जल कर दे
सीमित कर सागर कर दे

मोड़े तू जिस ओर मुझे
चल दूँ दे जी-जान तुझे

चट्टानों से ढल कर के
निर्मल निर्झर सा कर दे

बहती जाऊं तेरी ओर
हर को लेकर अपनी ओर

पीड़ा मेरी हर कर के
वाणी मेरी सुन कर के

मंज़िल मेरी तय कर दे
ईश्वर मुझको जल कर दे
- वाणी मुरारका
Vani Murarka
[email protected]
विषय:
भक्ति और प्रार्थना (31)
सहजता (8)

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
वाणी मुरारका
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अगर सुनो तो
 अधूरी साधना
 गहरा आँगन
 चुप सी लगी है
 जल कर दे
 देश की नागरिक
 धीरे-धीरे
 शहर की दीवाली पर अमावस का आह्वान
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website