अप्रतिम कविताएँ

इक कविता
कुछ पल के उथले चिंतन से
कभी जनमती है इक कविता
वर्षों कवि के अंतर्मन में
कभी पनपती है इक कविता

दो नयनों में बन अश्रु-बिन्द
कभी चमकती है इक कविता
दो अधरों की मुस्कान बनी
कभी ठुमकती है इक कविता

सूने बिस्तर की सिलवटों में
कभी सिसकती है इक कविता
दो बाहों के आलिंगन में
कभी सिमटती है इक कविता

पूजा के श्रद्धा सुमनों सी
कभी महकती है इक कविता
क्रोधाग्नि की ज्वाला बन कर
कभी धधकती है इक कविता

वात्सल्य भरी, ममतामय सी
कभी छलकती है इक कविता
आवेश ईर्ष्या द्वेष भरी
कभी उफ़नती है इक कविता

मेरे मत से उत्पन्न हो कर
मेरे भावों से निखर सँवर
तेरे निष्ठुर मन तक भी क्या
कभी पहुँचती है इक कविता ?
- अर्चना गुप्ता
Archana Gupta
Email : [email protected]
विषय:
सृजन (11)

काव्यालय पर प्रकाशित: 1 Apr 2016

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तुम्हारे युद्ध के
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जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

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छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
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सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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