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एक बौनी बूँद
एक बौनी बूँद ने
मेहराब से लटक
अपना कद
लंबा करना चाहा
बाकी बूँदें भी
देखा देखी
लंबा होने की
होड़ में
धक्का मुक्की
लगा लटकीं
क्षण भर के लिए
लंबी हुई
फिर गिरीं
और आ मिलीं
अन्य बूँदों में
पानी पानी होती हुई
नादानी पर अपनी।
-
दिव्या माथुर
Divya Mathur
email:
[email protected]
विषय:
वर्षा (4)
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धत्
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इस महीने :
'नदी के द्वीप'
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।
माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'कल'
रणजीत मुरारका
कल कहाँ किसने
कहा देखा सुना है
फिर भी मैं कल के लिए
जीता रहा हूँ।
आज को भूले
शंका सोच भय
से काँपता
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
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