अप्रतिम कविताएँ
अविद्या और विद्या
अन्धतमः प्र विशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूयऽइव ते तमो यऽउ विद्यायां रताः ।।
(यजु 40/12)
मात्र अविद्या की उपासना जो करते हैं,
घनान्धतम में वे प्रवेश करते रहते हैं।
उनसे अधिक अंधेरे, उनको घेरे रहते,
उपासना विद्या की केवल जो करते हैं !
अन्यदेवाहुर्विद्यायाऽ अन्यदाहुरविद्यायाः।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचाक्षिरे।।
(यजु 49/13)
विद्या और अविद्या पथ के श्रेय भिन्न हैं,
कर्म भिन्न, परिणाम भिन्न हैं, प्रेय भिन्न हैं।
इतना ही हम धीरों से सुनते आये हैं,
तरह-तरह से वह यह ही कहते आये हैं!
- अज्ञात
- अनुवाद : अमृत खरे
पुस्तक 'श्रुतिछंदा' से
विषय:
अध्यात्म दर्शन (38)

काव्यालय को प्राप्त: 25 Sep 2023. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Dec 2023

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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