इस महीने
मेरी कविता ~ विनोद तिवारी
कितना है विस्तार सृष्टि में,
फिर भी कितनी सीमायें हैं।
सब कुछ है उपलब्ध जगत में,
फिर भी कितनी कुंठायें हैं।
मेरी धरती अगर कभी आकाश हुई तो
...
इक कविता ~ अर्चना गुप्ता
कुछ पल के उथले चिंतन से
कभी जनमती है इक कविता
वर्षों कवि के अंतर्मन में
कभी पनपती है इक कविता
आगे...
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