स्वीकार करो यह प्रार्थना
हे प्रभु अब हिम्मत और विश्वास रख पाने का बल दो
काल के पंजों को रोक जीवन का अमृत विमल दो

भय से है आक्रांत मानव लाश ढोते थक गया है
निर्भय करो अपनी कृपा से मन में आशाएं प्रबल दो

इस आपदा के काल में भी लिप्त हैं जो स्वार्थ में
उनकी आंख में पानी मन में भावनायें सजल दो

माना कि मानव भूल कर बैठा है तुमको भूल कर
किंतु हमको तात हे देकर क्षमा भक्ति अचल दो

तुम जो करोगे अच्छा ही होगा पूर्ण हमें विश्वास है
जैसे तुम्हें लगता उचित वैसे इस मुश्किल का हल दो

सृष्टि क्रंदन कर रही बस इक तुम्हारा आसरा है
अश्रु इसके पोंछ कर सुरभित हंसी निर्मल नवल दो
- शरद कुमार

काव्यालय को प्राप्त: 27 Apr 2021. काव्यालय पर प्रकाशित: 7 May 2021

***
इस महीने :
'गेंद और सूरज'
नूपुर अशोक


बच्चों की एक दुनिया है,
जिसमें एक गेंद है
और एक सूरज भी है।
सूरज के ढलते ही
रुक जाता है उनका खेल
और तब भी
जब गेंद चली जाती है
अंकल की छत पर।

अंकल की दुनिया में है
टीवी और अखबार
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'गुल्लू'
प्रदीप शुक्ला


'गुल्लू-मुल्लू', 'पारू बच्चा'
नाम एक से एक है अच्छा
'गौरी', 'गुल्लू', 'छोटा माँऊँ'
गिनते जाओ नाम सुनाऊँ
'गुल्ला रानी' बड़ी सयानी
दादी कहतीं सबकी नानी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :

'कौआ'
जया प्रसाद


घर के बाहर कौआ बैठा काँव-काँव चिल्लाता है।
कौन है आने वाला इसकी खबरें कौआ लाता है।

पापा की मौसी के घर से गुड़ की भेली आनी हो,
उस दिन सुबह सवेरे उठता जैसे बुढ़िया नानी हो,
चीख-चीख कर घर वालों को कौआ राग सुनाता है।
उस दिन सबसे पहले क्यों, मुझको नहीं जगाता है ?

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'लॉकडाउन और मैं'
टुषी भट्टाचार्य


गज़ब वो दिन थे, मैदानों पर होते थे जब सारे खेल;
अब तो घर में बैठे हैं बस, सर में खूब लगाकर तेल।
पुस्तकें सारी पढ़ डाली हैं, रंग डाले हैं सारे चित्र,
धमाचौकड़ी करें भी कैसे, अब जो घर न आते मित्र।
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय

a  MANASKRITI  website