अप्रतिम कविताएँ
स्मृति
उस नैनरस के स्मरण भर से ,
मेरे भाव बादल बन गए,
अश्रु झिलमिला उठे और,
स्वप्न काजल बन गए।
पाथेय पर आशाएं बिखरी,
लगा सूर्य क्षितिज से झाँकने,
देख पथ के जुगनू,नभ के तारे,
कुछ सोचकर, कुछ आंकने।
अपने आलिंगन में कर लिया,
जब वायु ने सुगंध को,
आश्रय मिला तेरे ह्रदय का,
मेरे मन स्वछन्द को।
अब भी है अंकित ,इस दृष्टि में,
वो कोमल छवि,वो नैनरस,
समय के पाथेय से,
चुरा रखा है मैंने हर दिवस...
- चेतना पंत
Chetna Pant
Email: nikcathy<at>gmail.com
Chetna Pant
Email: [email protected]
विषय:
प्रेम (63)
बीता समय (18)

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
चेतना पंत
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ

 अथाह
 स्मृति
इस महीने :
'यह करूँगा मैं'
सुहैर हम्माद


नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'ठहराव'
राहुल सिंह 'राहु'


आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
बस यूँ ही देखें सब कुछ,
इत्मीनान से...
जियें इस पल के गुमान से,
जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website