अप्रतिम कविताएँ
अथाह
दुःख में, दुखों के गर्भ में,
सुख के अनछुए सन्दर्भ में,
आयु है क्या, क्या आंकलन,
न समय, न समय का ही स्मरण |
थाह पा लूं, यदि इस अथाह की,
तो इस चंचल चिरायु चाह की,
गति को अपनी गति मिले,
चाहे भाव मिले या क्षति मिले |
इस कोमल कल्पना को तोलकर,
भाव शब्दों में बोलकर,
चिरनिद्रा मृत्यु कि पा लूं मैं
दुखों को छंद दे, गा लूं मैं,
यही आस है, यही कामना,
शीघ्र हो अथाह से सामना |
- चेतना पंत
Chetna Pant
Email: [email protected]
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 अथाह
 स्मृति
इस महीने :
'तोड़ती पत्थर'
सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'


वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय, कर्म-रत मन,
..

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इस महीने :
'एक अदद तारा मिल जाये'
सत्येन्द्र कुमार रघुवंशी


एक अदद तारा मिल जाये
तो इस नीम अँधेरे में भी
तुमको लम्बा ख़त लिख डालूँ।

छोटे ख़त में आ न सकेंगी
पीड़ा की पर्वतमालाएँ
और छटपटाहट की नदियाँ।
पता नहीं क्या वक़्त हुआ है,
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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