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शीत का आतंक
कटकटाती शीत में
सूर्य के सामने ही
आज फिर से
कल की तरह
पारदर्शी हिम पर्त
मेरे हृदय पर पड़ गई
और मेरे ज्ञान का सूर्य
देखने भर को विवश था।
कर भी सकता क्या भला
परतें पड़ीं जिसके ह्रदय पर
हाथ ठिठुरे
पैर ठिठुरे
आंसुओं पर भी लगा गंभीर पहरा
और मेरी इस बेबसी पर
हँस रहा था कोहरा
हो कर के दोहरा
-
लक्ष्मी नारायण गुप्त
विषय:
सर्दी (5)
अन्तर्मन (14)
काव्यालय को प्राप्त: 10 Jan 2020. काव्यालय पर प्रकाशित: 27 Nov 2020
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हम नदी के द्वीप हैं।
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..
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..
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