अप्रतिम कविताएँ
रंग और मैं

बड़े निराले होते हैं,
जीवन के ये रंग।
कभी उषा की लालिमा
बन कर मन में
आशाओं के कमल
खिला जाते हैं
तो कभी
निराशा की स्याही में
सब डुबा डालते हैं।

किस रंग की
चर्चा करूँ मैं ?
वह जो तरुणाई में
प्रेम की रक्तिम आभा बनकर
लुभाता रहा
अथवा वह
जो सुखी परिवार
की हरियाली में मन को
परितृप्त करता रहा?

रंग-बिरंगी उस बगिया में
कब पतझड़ आया,
पता ही नहीं चला।
सारे रंग विलीन हो गये
शून्य में
और तभी प्रकट हुआ
एक शुभ्र आलोक,
कानों में गूंजा
अनहद नाद, ओंकार का,
सत्य के पवित्र श्वेत रंग में
समा गए
जीवन के सभी रंग
और मन डूब गया
ब्रह्मानंद के सागर में!!
- आशा जायसवाल
काव्यपाठ: नूपुर अशोक
विषय:
अध्यात्म दर्शन (37)
रंग (3)

काव्यालय को प्राप्त: 26 Mar 2025. काव्यालय पर प्रकाशित: 13 Mar 2026

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इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

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इस महीने :
'गुनाह का गीत'
धर्मवीर भारती


अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे
अगर मैंने किसी के नैन के बादल कभी चूमे
महज इससे किसी का प्यार मुझको पाप कैसे हो?
महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?

तुम्हारा मन अगर सींचूँ
गुलाबी तन अगर सीचूँ तरल मलयज झकोरों से!
तुम्हारा चित्र खींचूँ प्यास के रंगीन डोरों से
कली-सा तन, किरन-सा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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