अप्रतिम कविताएँ पाने
प्रतीक्षा के पल
जहाँ भी देखूँ तुम्हीं हो हर ओर
प्रतीक्षा के पल, फिर कहाँ किस ओर ॥

चेहरे पर अरुणाई सी खिल जाती
धड़कनें स्पन्दन बन मचल जाती
यादों की बारिश में, नाचे मन मोर ॥

कब तन्हा जब साथ तुम, बन परछाई
साथ देख तुम्हारा खुदा भी मांगे मेरी तन्हाई
मेरे हर क्षण को सजाया, तुमने चित्त चोर ॥

मेरे संग चांद भी करता रहता इंतज़ार
तेरी हर बात को उससे कहा मैंने कितनी बार
फिर भी सुनता मुस्कुराकर, जब तक न होती भोर ॥

तुम्हारे लिए हूँ मैं शायद, बहुत दूर
तुम पर पास मेरे, जितना आँखों के नूर
मेरी साँसों को बाँधे, तेरे स्नेह की डोर ॥
- माहिमा बोकाडिया
Mahima Bokariya
Email: [email protected]
Mahima Bokariya
Email: [email protected]

***
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सौन्दर्य और सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।

₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
इस महीने :
'ओस जितनी नमी '
जया प्रसाद


एक नाप जितनी ख़लिश
ख़लती नहीं
चलती है

जैसे ओस की बूंद जितना
सीलापन
जैसे नींद के बाद वाली
हलकी सी थकन --
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
अक्षर नगरी

एक थी अक्षर नगरी सुन्दर
उसमें रहते सारे अक्षर।
एक था छोटा बच्चा अ,
उसका भाई बड़क्का आ।
अ की सखी थी छोटी इ।
उसकी बड़ी बहन थी ई।
चारों बच्चे बहुत दोस्त थे;
साथ खेलते और पढ़ते थे।

एक बार वे चारों बच्चे
एक पार्क में खेल रहे थे।
उस दिन उनके उसी पार्क
में चार नए बच्चे आये थे।

... पूरी रचना यहाँ पढ़ें

इस महीने :
'इस नश्वर संसार में'
कुंदन सिद्धार्थ


सिर्फ़ दुख नहीं जाता
सुख भी चला जाता है
यहाँ रहने कौन आया है

सिर्फ़ घृणा नहीं हारती
प्रेम भी हार जाता है

संसार में सबसे दुखभरी होती है प्रेम की हार
तब प्रेम सिर्फ़ कविताओं और कहानियों में
बचा रह जाता है

यही बचा हुआ प्रेम
हमारी आँखों में ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना | काव्य विभाग: शिलाधार युगवाणी नव-कुसुम काव्य-सेतु | प्रतिध्वनि | काव्य लेख
आपकी कविता | सम्पर्क करें | हमारा परिचय
सहयोग दें

a  MANASKRITI  website