अप्रतिम कविताएँ
प्रतीक्षा के पल
जहाँ भी देखूँ तुम्हीं हो हर ओर
प्रतीक्षा के पल, फिर कहाँ किस ओर ॥

चेहरे पर अरुणाई सी खिल जाती
धड़कनें स्पन्दन बन मचल जाती
यादों की बारिश में, नाचे मन मोर ॥

कब तन्हा जब साथ तुम, बन परछाई
साथ देख तुम्हारा खुदा भी मांगे मेरी तन्हाई
मेरे हर क्षण को सजाया, तुमने चित्त चोर ॥

मेरे संग चांद भी करता रहता इंतज़ार
तेरी हर बात को उससे कहा मैंने कितनी बार
फिर भी सुनता मुस्कुराकर, जब तक न होती भोर ॥

तुम्हारे लिए हूँ मैं शायद, बहुत दूर
तुम पर पास मेरे, जितना आँखों के नूर
मेरी साँसों को बाँधे, तेरे स्नेह की डोर ॥
- माहिमा बोकाडिया
Mahima Bokariya
Email: [email protected]
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विषय:
प्रेम (62)

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इस महीने :
'नदी के द्वीप'
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'


हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
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पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'कल'
रणजीत मुरारका


कल कहाँ किसने
कहा देखा सुना है
फिर भी मैं कल के लिए
जीता रहा हूँ।

आज को भूले
शंका सोच भय
से काँपता
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