लाचारी
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है
हृदय से कहता हूँ कुछ गा
प्राण की पीड़ित बीन बजा
प्यास की बात न मुँह पर ला
यहाँ तो सागर खारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है
सुरभि के स्वामी फूलों पर
चढ़ये मैंने जब कुछ स्वर
लगे वे कहने मुरझाकर
ज़िन्दगी एक खुमारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है
नहीं है सुधि मुझको तन की
व्यर्थ है मुझको चुम्बन भी
अजब हालत है जीवन की
मुझे बेहोशी प्यारी है
न जाने क्या लाचारी है
आज मन भारी-भारी है
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रमानाथ अवस्थी
Poet's Address: 14/11, C-4 C Janakpuri, New Delhi
Ref: Naye Purane, 1998
इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
शान्ति मेहरोत्रा
चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?
मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;
तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!
मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
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इस महीने :
'नफ़रत'
विस्सावा शिंबोर्स्का
देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!
यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद
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