कौन रंग फागुन रंगे
कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत,
प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।

रोमरोम केसर घुली, चंदन महके अंग,
कब जाने कब धो गया, फागुन सारे रंग।

रचा महोत्सव पीत का, फागुन खेले फाग,
साँसों में कस्तूरियाँ, बोये मीठी आग।

पलट पलट मौसम तके, भौचक निरखे धूप,
रह रहकर चितवे हवा, ये फागुन के रूप।

मन टेसू टेसू हुआ तन ये हुआ गुलाल
अंखियों, अंखियों बो गया, फागुन कई सवाल।

होठोंहोठों चुप्पियाँ, आँखों, आँखों बात,
गुलमोहर के ख्वाब में, सड़क हँसी कल रात।

अनायास टूटे सभी, संयम के प्रतिबन्ध,
फागुन लिखे कपोल पर, रस से भीदे छंद।

अंखियों से जादू करे, नजरों मारे मूंठ,
गुदना गोदे प्रीत के, बोले सौ सौ झूठ।

पारा, पारस, पद्मिनी, पानी, पीर, पलाश,
प्रंय, प्रकर, पीताभ के, अपने हैं इतिहास।

भूली, बिसरी याद के, कच्चेपक्के रंग,
देर तलक गाते रहे, कुछ फागुन के संग।
- दिनेश शुक्ल
काव्यपाठ: पारुल 'पंखुरी'

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इस महीने :
'शीत का आतंक'
लक्ष्मी नारायण गुप्त


कटकटाती शीत में
सूर्य के सामने ही
आज फिर से
कल की तरह
पारदर्शी हिम पर्त
मेरे हृदय पर पड़ गई
और मेरे ज्ञान का सूर्य
देखने भर को विवश था।
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इस महीने :
'आशा कम विश्वास बहुत है'
बलबीर सिंग 'रंग'


जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम, विश्वास बहुत है।

सहसा भूली याद तुम्हारी
उर में आग लगा जाती है
विरह-ताप भी मधुर मिलन के
सोये मेघ जगा जाती है,
मुझको आग और पानी में
रहने का अभ्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की
आशा कम, विश्वास बहुत है।
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मैं अँधेरों से निकल कर,
ढूँढ लाऊँगा उजाले।
मृत्यु पर भी हो विजयिनी,
ज्योति यह अमरत्व पा ले।
तुम खड़ी हो राह में,
विश्वास के दीपक जलाये।
ये भटकते गीत मेरे,
लो तुम्हारे पास आये।

~ विनोद तिवारी
(कविता "लो तुम्हारे पास आए" से)
दीपावली की शुभ कामनाएँ। मन में विश्वास के दीप जलते रहें।
इस महीने :

'एक ईमेल की कहानी'
वाणी मुरारका


एक समय की बात है, एक संवेदनशील, स्नेहिल पुरुष ने एक प्यारी, बुद्धु, डरी हुई लड़की को एक ईमेल भेजा।

वह लड़की किसी बात से विचलित थी, और ऐसी मन:स्थिति में उसने कह डाला, “अगर ऐसा हुआ, मेरे मन में अपने प्रति सम्मान नहीं बचेगा।“

वह लड़की विचलित होने में व्यस्त थी, तो उसके बीच में उस पुरुष ने कुछ नहीं कहा। अगले दिन उन्होंने एक ईमेल भेजा।
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