अप्रतिम कविताएँ पाने
कवितावली
अवधेस के द्वारे सकारे गई सुत गोद में भूपति लै निकसे ।
अवलोकि हौं सोच बिमोचन को ठगि-सी रही, जे न ठगे धिक-से ॥
'तुलसी' मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन जातक-से ।
सजनी ससि में समसील उभै नवनील सरोरुह-से बिकसे ॥

तन की दुति श्याम सरोरुह लोचन कंज की मंजुलताई हरैं ।
अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंग की दूरि धरैं ॥
दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि ज्यों किलकैं कल बाल बिनोद करैं ।
अवधेस के बालक चारि सदा 'तुलसी' मन मंदिर में बिहरैं ॥

सीस जटा, उर बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी सी भौंहैं ।
तून सरासन-बान धरें तुलसी बन मारग में सुठि सोहैं ॥
सादर बारहिं बार सुभायँ, चितै तुम्ह त्यों हमरो मनु मोहैं ।
पूँछति ग्राम बधु सिय सों, कहो साँवरे-से सखि रावरे को हैं ॥

सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली ।
तिरछै करि नैन, दे सैन, तिन्हैं, समुझाइ कछु मुसुकाइ चली ॥
'तुलसी' तेहि औसर सोहैं सबै, अवलोकति लोचन लाहू अली ।
अनुराग तड़ाग में भानु उदै, बिगसीं मनो मंजुल कंजकली ॥
- गोस्वामी तुलसीदास

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 कवितावली
 बालकाण्ड (रामचरितमानस अंश)
इस महीने :
'अक्कड़ मक्कड़'
भवानीप्रसाद मिश्र


अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं।
..

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वो मेरी जिंदगी में कुछ इस तरह मिले
जैसे छोटी सी छत पर कोई बड़ी पतंग गिरे।
बारहा अब यही डर सताता रहता है के
वक़्त का शैतान बच्चा मुझसे इसे छीन न ले।

~ विनीत मिश्रा
इस महीने :
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प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!
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..

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