अप्रतिम कविताएँ
यूँ छेड़ कर धुन
यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर रुक गया
कि मैं विवश सा गुनगुनाता रहा
सारी रात
उस छूटे हुए टूटे हुए सुर को
सुनहरी पंक्तियों के वस्त्र पहनाता रहा
गाता रहा

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर रुक गया
कि मैं मानस की दीवारों पर चित्र भर
ले कल्पना की तूलिका
और भाव के उजले बसंती रंग भरता रहा
जैसे स्वप्न से मिलने को आतुर

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर रुक गया
मैं समय की मुक्तावली को रख परे
उन्माद नयनों में भरे
विस्तीर्ण नभ से धरा तक ढूँढा किया
ध्वनिस्रोत
खोया थिरकते पग का नूपुर

यूँ छेड़ कर धुन कोई सुमधुर
- कमलेश पाण्डे 'शज़र'
Kamlesh Pandey
Email : [email protected]
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 काश़
 यूँ छेड़ कर धुन
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
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अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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