अप्रतिम कविताएँ
काश़
ना समझ सका
मैं खुद जिसको
अधखुला राज़
अनकही बात
मैं काश़ तुम्हे समझा पाता

तेरी नज़रों के
दो सवाल
दो प्रश्नचिन्ह
जिनके जवाब
मैं काश़ कभी लौटा पाता

कच्चे धागे
इन सपनों के
उलझे उलझे
सुलगे सुलगे
मैं काश़ कभी सुलझा पाता

जुगनू बिखराती
चाँद रात
हाथों में हाथ
दो पल का साथ
मैं काश कभी दोहरा पाता

ख़्वाबों से महकी
सरज़मीं
वो दिलनशीं
कितनी हसीं
मैं काश तुम्हे दिखला पाता

वो गया मोड़
हम साथ छोड़
हैं अलग अलग
इक कड़वा सच
मैं काश इसे झुठला पाता
- कमलेश पाण्डे 'शज़र'
Kamlesh Pandey
Email : [email protected]
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विषय:
चुप्पी (7)
रिश्ते (18)

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 काश़
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'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

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आओ हम न सोचें कुछ,
न खोजें कुछ,
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इत्मीनान से...
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जो रोक रहा हमें,
कौन सा यह भ्रम है?
..

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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