अप्रतिम कविताएँ
काश़
ना समझ सका
मैं खुद जिसको
अधखुला राज़
अनकही बात
मैं काश़ तुम्हे समझा पाता

तेरी नज़रों के
दो सवाल
दो प्रश्नचिन्ह
जिनके जवाब
मैं काश़ कभी लौटा पाता

कच्चे धागे
इन सपनों के
उलझे उलझे
सुलगे सुलगे
मैं काश़ कभी सुलझा पाता

जुगनू बिखराती
चाँद रात
हाथों में हाथ
दो पल का साथ
मैं काश कभी दोहरा पाता

ख़्वाबों से महकी
सरज़मीं
वो दिलनशीं
कितनी हसीं
मैं काश तुम्हे दिखला पाता

वो गया मोड़
हम साथ छोड़
हैं अलग अलग
इक कड़वा सच
मैं काश इसे झुठला पाता
- कमलेश पाण्डे 'शज़र'
Kamlesh Pandey
Email : [email protected]
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विषय:
चुप्पी (7)
रिश्ते (17)

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 काश़
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'गले मिलते रंग'
विनोद दास


आह्लाद में डूबे रंग खिलखिला रहे हैं

इतने रंग हैं
कि फूल भी चुरा रहे हैं रंग
आज तितलियों के लिए

गले मिल रहे हैं रंग

जब मिलता है गले एक रंग
दूसरे रंग से
बदल जाता है ...
..

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इस महीने :
'नदी के द्वीप'
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'


हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
..

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