अप्रतिम कविताएँ
उद्गार
रात के तीसरे पहर
कोयल की कूक ने हमको जगाया,
और कहा,
नए उषाकाल का
नए रंग, नयी चुनर का
आहवान करो !
किस मोड़ पर आकर रुक गए हो?
यादों की चादर ओढ़े
नयी तमन्ना, नयी उमंग,
कहानी नयी है।
किसी ने कहा बसंत आ गया,
किसी ने
बसंत आता नहीं ले आया जाता है।
हमने महसूस किया
यह वो तरंग है जो बहती है रगों में
निरंतर, रंगीन, नित नूतन।
- रणजीत मुरारका
Ranjeet Murarka
Email : [email protected]
विषय:
जीवन (37)

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 सुकूने-दिल
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी


रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार

स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’


ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।

हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए

..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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