अप्रतिम कविताएँ
प्रथम सकल सुचि मज्जन अमल बास
प्रथम सकल सुचि मज्जन अमल बास,
जावक सुदेस केस-पास को सम्हारिबौ।
अंगराज भूषन बिबिध मुखबास-राग,
कज्जल कलित लोल लोचन निहारिबौ॥
बोलनि हँसनि मृदु चाकरी, चितौनि चार,
पल प्रति पर प्रतिबत परिपालिबौ।
'केसोदास' सबिलास करहु कुँवरि राधे,
इहि बिधि सोरहै सिंगारनि सिंगारिबौ॥
- केशवदास
Ref: Swantah Sukhaaya
Pub: National Publishing House, 23 Dariyagunj, New Delhi - 110002

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मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें होमेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

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