अप्रतिम कविताएँ
फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
टूटे आस्तीन का बटन
या कुर्ते की खुले सिवन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        फूल नहीं बदले गुलदस्तों के
        धूल मेजपोश पर जमी हुई।
        जहाँ-तहाँ पड़ी दस किताबों पर
        घनी सौ उदासियाँ थमी हुई।
पोर-पोर टूटता बदन
कुछ कहने-सुनने का मन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        अरसे से बदला रूमाल नहीं
        चाभी क्या जाने रख दी कहाँ।
        दर्पण पर सिंदूरी रेख नहीं
        चीज़ नहीं मिलती रख दो जहाँ।
चौक की धुआँती घुटन
सुग्गे की सुमिरिनी रटन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
        किसे पड़ी, मछली-सी तड़प जाए
        गाल शेव करने में छिल गया।
        तुमने जो कलम एक रोपी थी
        उसमें पहला गुलाब खिल गया।
पत्र की प्रतीक्षा के क्षण
शहद की शराब की चुभन
कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के।
- उमाकान्त मालविय
विषय:
विरह (13)
विवाह (8)

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इस महीने :
'बन्धन दूँ क्यों'
शान्ति मेहरोत्रा


चिर मुक्ति न दे पायी जिसको, उसको फिर बन्धन दूँ तो क्यों?

मधुमय प्रभात की बेला में,
रवि ने संध्या का किया मोल;
तब कमल दलों ने भंवरों को,
निज बन्दीगृह से दिया खोल;

तो भी मेरे भोले बन्दी!
तुम भी निज को आजाद करो;
फिर साहस लेकर एक बार,
सूनी कुटिया आबाद करो!

मैं आत्म-समर्पण कर न सकी, झूठा अभिनन्दन दूँ तो क्यों?
..

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भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से, भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।

प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...

पूरे आलेख को इस लिंक पर पढ़ें -
इस महीने :
'नफ़रत'
विस्सावा शिंबोर्स्का


देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!

यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद ..

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इस महीने :
'न्यूज़ चैनल'
प्रियदर्शन


यहाँ त्रासदियाँ
प्रहसन में बदली जाती हैं,
भाषा तमाशे में
और लोग कठपुतलियों में।
तबाहियों की खुराक
इसका पेट भरती है।
बहुत मनोयोग से
किया जाता है
..

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