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ओस जितनी नमी
एक नाप जितनी ख़लिश
ख़लती नहीं
चलती है
जैसे ओस की बूंद जितना
सीलापन
जैसे नींद के बाद वाली
हलकी सी थकन --
मुझे नहीं खोनी
अपनी सारी शिकन।
कुछ लकीरें मेरी मुस्कराहट की हैं
और कुछ खोरों की ज़रूरी नमी
तुम देख लेना
कब, कैसे, कितना होना है
बस कम से कम
मेरी कविता जितने रहना।
-
जया प्रसाद
विषय:
अधूरापन (3)
काव्यालय को प्राप्त: 30 Oct 2022. काव्यालय पर प्रकाशित: 25 Nov 2022
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अघट घटती जा रही है
आठ वर्ष
ओस जितनी नमी
कौआ
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
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जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
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अतीत को खरोंचते हुए
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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