आठ वर्ष
रिमझिम सावन बरसा जब
अंक तुम्हें भर लायी थी
कुछ खोयी सी, कुछ अबूझ
कुछ खुश, कुछ घबराई थी
गोल मटोल, चार पैर पर
घर आँगन सब नाप लिया
नन्हे वामन जैसे तुमने
मेरा परिसीमन भांप लिया
पहली बार तीस मिनट जब
तुमसे हुई जुदाई थी
दरवाज़े पर बैठी बैठी
रो रो आँख सुजायी थी
धीरे धीरे ज्ञात हुआ
तुम ऐसे नहीं हो वैसे हो
जगह जगह सुनती आयी
तुम जाने कैसे कैसे हो
ठोक पीट कर सांचे में
तुमको सबने गढ़ना चाहा
पर मैंने पूरे मन से
सिर्फ तुम्हें पढ़ना चाहा
मुझको नियमों कानूनों से
दस्तूरों से कुछ काम नहीं
ये हम दोनों की दुनिया है
यहाँ और किसी का नाम नहीं
जो मुखरित होते शब्दों में
उनके भी भाव बिखरते हैं
तुम आँखों से जो कहते हो
वो सीधे, हृदय उतरते हैं
सब कहते हैं , तुम मुझसे हो
मैं तुमसे जीवन पाती हूँ
तुम सोते हो जब आँख भींच
मैं देख देख भर जाती हूँ ...
काव्यालय को प्राप्त: 2 Jul 2020.
काव्यालय पर प्रकाशित: 9 Oct 2020
भावुकता और पवित्रता

भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
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इस महीने :
'नफ़रत'
विस्सावा शिंबोर्स्का
देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!
यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद
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इस महीने :
'राम की जल समाधि'
भारत भूषण
पश्चिम में ढलका सूर्य उठा वंशज सरयू की रेती से,
हारा-हारा, रीता-रीता, निःशब्द धरा, निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम था टेर रहा सीता-सीता।
किसलिए रहे अब ये शरीर, ये अनाथमन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, धरती मुझको किसलिए सहे।
तू कहाँ खो गई वैदेही, वैदेही तू खो गई कहाँ,
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