अप्रतिम कविताएँ
नित्या
सुनो नित्या!
मत भूलो कि
केवल भूमिजा नहीं
यज्ञसेना भी हो तुम

सुलग रही होगी
अब भी
भीतर कहीं
अंजुरि भर अग्नि
आई थी जो
संग तुम्हारे
अंग तुम्हारे

प्रज्वलित करो उसे!

नहीं हुआ है जन्म तुम्हारा
कि करो आत्मसात
सारा दुराचार
कि समा जाओ मातृ अंक में
सुन कोई आरोप निराधार

जानो!
कि लाया गया
कि बुलाया गया
तुम्हें,
मिटाने को
अनवरत बढ़ता
अनाचार,
बार बार
- सुदर्शन शर्मा
Sudarshan Sharma
Email: [email protected]
Sudarshan Sharma
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विषय:
स्त्री (19)

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 नित्या
 लड़कियाँ
इस महीने :
'यह करूँगा मैं'
सुहैर हम्माद


नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'मौन के शब्द'
ऋतु शर्मा नन्नन पाँडे


छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।

बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने

ईंटों की दीवा ..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।

देखिए शिव बहादुर सिंह भदौरिया की कविता "नदी का बहना मुझमें हो" पर विशेष प्रस्तुति
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