Toggle navigation
English Interface
संग्रह से कोई भी रचना
काव्य विभाग
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
मुक्तक
प्रतिध्वनि
काव्य लेख
सहयोग दें
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
हे प्रियतम
हे प्रियतम
अद्भुत छवि बन
सुन्दरतम
बसे हो तुम
मन मन्दिर मे
आराध्य बन
भ्रमर जैसे
पागल बन ढूँढू
मैं पुष्पवन
तुम झरना
मैं इंद्रधनुष के
रंगीन कण
चंचलता मैं
ज्यों अल्हड़ लहर
सागर तुम
तुम विशाल
अनंत युग जैसे
मैं एक क्षण
हो तरुवर
अडिग धीर स्थिर
तो मैं पवन
जैसे ललाट
पर कोरी बिन्दिया
सजे चन्दन
हे प्रियतम....
-
मानोशी चटर्जी
Manoshi Chatterjee
Email :
[email protected]
Manoshi Chatterjee
Email :
[email protected]
विषय:
प्रेम (63)
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।
₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
मानोशी चटर्जी
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ
आज कुछ माँगती हूँ प्रिय...
पतझड़ की पगलाई धूप
प्रिय तुम...
शाम हुई और तुम नहीं आये
हे प्रियतम
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
विशेष प्रस्तुति
इस महीने :
'सृष्टि का सार'
अंशु जौहरी
रंगों की मृगतृष्णा कहीं
डरती है कैनवस की उस सादगी से
जिसे आकृति के माध्यम की आवश्यकता नहीं
जो कुछ रचे जाने के लिये
नष्ट होने को है तैयार
स्वीकार्य है उसे मेरी,
काँपती उंगलियों की अस्थिरता
मेरे अपरिपक्व अर्थों की
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'लेखक'
आशीष क़ुरैशी ‘माहिद’
ख़ाली पन्ना किसी खेत-सा
पड़ा रहता है उजाड़।
क़लम की नोक ही बनती है
कुदाल, हँसिया और हल।
हल, जो यादों को कुरेदते हुए
अतीत को खरोंचते हुए
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
संग्रह से कोई भी रचना
| काव्य विभाग:
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
|
प्रतिध्वनि
|
काव्य लेख
सम्पर्क करें
|
हमारा परिचय
सहयोग दें