अप्रतिम कविताएँ
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
- विनोद कुमार शुक्ल
विषय:
समाज (32)
रिश्ते (17)
अन्तर्मन (14)

काव्यालय को प्राप्त: 15 Jun 2023. काव्यालय पर प्रकाशित: 20 Oct 2023

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