अप्रतिम कविताएँ
गा रही मैं गीत में तूफ़ान!
गा रही मैं गीत में तूफ़ान!

आज जबकि सप्त सागर खौलते हैं
आज जबकि प्रलय के स्वर गूंजते हैं
आज घिरता आ रहा जब विश्व का अवसान
गा रही मैं गीत में तूफ़ान!

गीत मेरा सृष्टि का संहार रोके
झेल झंझावात सारे ध्वंस पारावार रोके
खण्डरों पर मैं करूँ नव विश्व का निर्माण
गा रही मैं गीत में तूफ़ान!

जो कि कर दे युवतियों में आग पैदा
वीरता के भाव पैदा औ’ प्रबल उत्साह पैदा
मैं शवों, जड़ पत्थरों में फूँक दूँगी प्राण
गा रही मैं गीत में तूफ़ान!
- सूर्यकुमारी माहेश्वरी
विषय:
संकल्प (14)

काव्यालय को प्राप्त: 1 Jul 2018. काव्यालय पर प्रकाशित: 16 Aug 2018

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'रंग'
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तुम्हारे पास बहुत से रंग हैं
दोस्ती, प्यार, इकरार,
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निश्छल मुस्कान का ... ..

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आह्लाद में डूबे रंग खिलखिला रहे हैं

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आज तितलियों के लिए

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जब मिलता है गले एक रंग
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..

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