दिसंबर की डाल पर खिलकर
चुपचाप मुरझा चुके हैं
ग्यारह फूल
मधुमक्खियाँ आईं
खेले भँवरे भी उनकी गोद में,
कितना लूटा किसने
नहीं जानते
बीत चुके ग्यारह फूल
बारहवाँ फूल खिला है संकोच में
वह जानता है
उन फूलों के अवदान को
अपने प्रति
हवाएँ नाच-नाच कर सोख रही हैं
फूल का गीलापन,
फिर भी बाकी है मुस्कान फूल में
जैसे डाल पर सोई चिड़िया के परों में
बाकी बचा रहता है
उड़ान के साथ
थोड़ा-सा आसमान भी।
"कब तक सूरजमुखी बनें हम" कल्पना मनोरमा का नवगीत संग्रह है। इनके गीत और लघुकथाएँ कई साझा संकलनों में भी शामिल हो चुके है। "कस्तूरिया" इनका अपना ब्लॉग है।
भावुकता और पवित्रता
भाव-रस के लिए हमारे हृदय में एक स्वाभाविक लोभ होता है। काव्य और शिल्पकला से, गल्प, गान और अभिनय से,
भाव-रस का उपभोग करने का आयोजन हम करते रहते हैं।
प्राय: उपासना से भी हम भाव-तृप्ति चाहते हैं। कुछ क्षणों के लिए एक विशेष रस का आभोग करके हम यह सोचते
हैं कि हमें कुछ लाभ हुआ। धीरे-धीरे इस भोग की आदत एक नशा...
देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है
हमारी सदी की नफ़रत,
किस आसानी से चूर-चूर कर देती है
बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को!
किस फुर्ती से झपटकर
हमें दबोच लेती है!
यह दूसरे जज़्बों से कितनी अलग है --
एक साथ ही बूढ़ी भी और जवान भी।
यह खुद
..