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चल पथिक तू हौले से
टहल रहा गर भोर से पहले
पग तू रखना धीरे से
जगे हुए हैं जीव-जंतु
मानव तुमसे पहले से
खरगोश, कीट और खग निकले
नीड़, बिल, कुंड से खुल के
चंचल अबोध छौने संग
चली हिरन निर्भयता से
दिन भर रहते सिकुड़ समेटे
वनस्पति में रुल छिपके
निर्भीक निडर और मस्त रहे वो
केवल ब्रह्म-मुहूरत में
होगा खाद्य श्रृंखला के
प्रथम पग पर तू जग के
व्याध का खेल रचा यहाँ पर
सुन्दर सूक्ष्म-संतुलन से
कोमल कोंपल मृदुल पत्ते
गीली घास धुले नम से
चन्द्रमा और सूर्य किरण संग
रचा भव्य रूपक नभ में
दर्शन करना गर तू चाहे
ऐसे स्वप्निल मन्ज़र के
सांस भी आये मद्धम तेरी
पग तू रखना धीरे से
-
प्रिया एन. अइयर
व्याध : शिकारी
विषय:
प्रकृति (41)
काव्यालय को प्राप्त: 5 Jul 2017. काव्यालय पर प्रकाशित: 8 Jan 2021
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..
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..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर
टीलों पर मन्दिर हों
और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ --
मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो
।
मेरा बदन काट कर नहरें
सभी को पोषण पहुँचाएँ।
देखिए
शिव बहादुर सिंह भदौरिया
की कविता
"नदी का बहना मुझमें हो"
पर
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