दिन भर एक कोलाहल के साध
उस हँसी के ठहाकों के बीच
जिन्दा रहने की वो जुजुत्सा
सामान्य दिखने का वो सफल प्रयास
दम तोड़ देता है
रात की आहट पर
जब घेरता है
वही कुहाँसा घनघोर अन्धेरा
और गिर पड़ती है
पानी की दो बूँदें
मेरे ही गालों पर
हमेशा की तरह ...
नहीं नाचूँगा मैं
तुम्हारे युद्ध के
नगाड़ों पर। न ही दूँगा
अपनी आत्मा, न ही अपनी अस्थियाँ
तुम्हारे युद्ध के नगाड़ों को। नहीं
नाचूँगा तुम्हारी
ताल पर। मैं जानता हूँ उस ताल को।
जान नहीं है उसमें। जिस चमड़े को
..
मुझमें ऐसी तरलता हो जैसे कि मुझमें नदी बह रही हो। मेरे तट पर टीलों पर मन्दिर हों और प्रिय-अप्रिय सभी को मैं स्वीकारूँ -- मच्छ मगर घड़ियाल, सभी का रहना मुझमें हो। मेरा बदन काट कर नहरें सभी को पोषण पहुँचाएँ।