छोटे-छोटे जूते लाइन में रखे थे,
मासूम आँखों में डर चिपका था,
नाम, धर्म, उम्र — सब मिटा दिए गए,
सिर्फ़ एक चिन्ह — स्टार ऑफ़ डेविड बाकी था।
बिना शोर के ट्रेनें चली थीं,
सपनों को डिब्बों में बंद कर,
हर स्टेशन पर कोई माँ रोई थी,
और बच्चों ने आँसू पीकर उत्तर दिया — “ठीक हूँ, माँ।”
ईंटों की दीवारें, कोनों की छाँव,
अंधेरे तहख़ानों में साँसे सिकुड़ी थीं,
जहाँ जीवन की खुराक एक रोटी थी,
और उम्मीद — एक खिड़की की दरार।
कैम्पों की राख से उड़ती हवाएँ,
आज भी उस गंध को ढोती हैं,
जहाँ एक नंबर बन गया नाम,
और इंसान — एक आँकड़ा मात्र।
पर वे ख़त्म नहीं हुए…
हर यहूदी आँख में अब इतिहास जलता है,
हर प्रार्थना में उनकी चीख़ें गूँजती हैं,
और हर मेनोराह की लौ कहती है —
“हम बचे हैं, ताकि तुम भूलो नहीं।”
"याद रखो — ताकि फिर कभी न हो।"
काव्यालय को प्राप्त: 30 Jun 2026.
काव्यालय पर प्रकाशित: 11 Sep 2026