भ्रम
दिन भर एक कोलाहल के साध
उस हँसी के ठहाकों के बीच
जिन्दा रहने की वो जुजुत्सा
सामान्य दिखने का वो सफल प्रयास
दम तोड़ देता है
रात की आहट पर
जब घेरता है
वही कुहाँसा घनघोर अन्धेरा
और गिर पड़ती है
पानी की दो बूँदें
मेरे ही गालों पर
हमेशा की तरह ...
- अरिफ खान
Arif Khan
email: [email protected]
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अरिफ खान
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 भ्रम
इस महीने: <a href="https://kaavyaalaya.org/p/kumar-ravindra">कुमार रवीन्द्र</a> की रचनाएँ

'मित्र सहेजो'
कुमार रवीन्द्र


मित्र सहेजो
हम जंगल से धूप-छाँव लेकर आये हैं

पगडण्डी पर वे बैठी थीं पाँव पसारे
पेड़ों ने थे फगुनाहट के बोल उचारे

उन्हें याद थे
ऋषियों ने जो मंत्र सूर्यकुल के गाये हैं
..

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'तैर रहा इतिहास नदी में'
कुमार रवीन्द्र


तैर रहा है
यहाँ, बंधु, इतिहास नदी में

खँडहर कोट-कँगूरे तिरते उधर मगध के
इधर लहर लेकर आई है अक़्स अवध के
काँप रही है
उनकी बूढ़ी साँस नदी में ..

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शुक्रवार 25 जनवरी को

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