अप्रतिम कविताएँ पाने
भ्रम
दिन भर एक कोलाहल के साध
उस हँसी के ठहाकों के बीच
जिन्दा रहने की वो जुजुत्सा
सामान्य दिखने का वो सफल प्रयास
दम तोड़ देता है
रात की आहट पर
जब घेरता है
वही कुहाँसा घनघोर अन्धेरा
और गिर पड़ती है
पानी की दो बूँदें
मेरे ही गालों पर
हमेशा की तरह ...
- अरिफ खान
Arif Khan
email: [email protected]
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 नियति
 भ्रम
इस महीने :
'हर मकान बूढ़ा होता'
कुमार रवीन्द्र


साधो, सच है
जैसे मानुष
धीरे-धीरे हर मकान भी बूढ़ा होता

देह घरों की थक जाती है
बस जाता भीतर अँधियारा
उसके हिरदय नेह-सिंधु जो
वह भी हो जाता है खारा

घर में
जो देवा बसता है
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
इस महीने :
'अधूरी'
प्रिया एन. अइयर


हर घर में दबी आवाज़ होती है
एक अनसुनी सी
रात में खनखती चूड़ियों की
इक सिसकी सी
..

पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें और सुनें...
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