Toggle navigation
English Interface
संग्रह से कोई भी रचना
काव्य विभाग
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
मुक्तक
प्रतिध्वनि
काव्य लेख
सहयोग दें
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
अप्रतिम कविताएँ
प्राप्त करें
✉
आज नदी बिलकुल उदास थी
आज नदी बिलकुल उदास थी।
सोयी थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर -
बादल का वस्त्र पड़ा था।
मैंने उसे नहीं जगाया,
दबे पाँव घर वापस आया।
-
केदारनाथ अग्रवाल
काव्यपाठ:
वाणी मुरारका
विषय:
प्रकृति (41)
नदी (3)
उदासी (19)
सहयोग दें
विज्ञापनों के विकर्षण से मुक्त, काव्य के सुकून का शान्तिदायक घर... काव्यालय ऐसा बना रहे, इसके लिए सहयोग दे।
₹ 500
₹ 250
अन्य राशि
केदारनाथ अग्रवाल
की काव्यालय पर अन्य रचनाएँ
आज नदी बिलकुल उदास थी
बसंती हवा
इस महीने :
'रंग'
गीता दूबे
तुम्हारे पास बहुत से रंग हैं
दोस्ती, प्यार, इकरार,
उम्मीदों और खुशियों के।
सपनों का तो रंग-बिरंगा
चंदोवा ही तान दिया है तुमने।
निश्छल मुस्कान का ... ..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
इस महीने :
'गले मिलते रंग'
विनोद दास
आह्लाद में डूबे रंग खिलखिला रहे हैं
इतने रंग हैं
कि फूल भी चुरा रहे हैं रंग
आज तितलियों के लिए
गले मिल रहे हैं रंग
जब मिलता है गले एक रंग
दूसरे रंग से
बदल जाता है ...
..
पूरी प्रस्तुति यहाँ पढें...
संग्रह से कोई भी रचना
| काव्य विभाग:
शिलाधार
युगवाणी
नव-कुसुम
काव्य-सेतु
|
प्रतिध्वनि
|
काव्य लेख
सम्पर्क करें
|
हमारा परिचय
सहयोग दें